GULAB SAHU vs VIJAY KUMAR SAHU

Court
Chhattisgarh High Court

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{MA(C) No. 380 of 2023}

CGHC010083362023 2026:CGHC:45097
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय , बिलासपुर
विविध अपील ( प्रतिकर ) क्रमांक -380 /2023

गुलाब साहू पिता इन्द्रभान साहू, आयु लगभग 33 वर्ष, निवासी मकान संख्या-214, वार्ड
संख्या-10, ग्राम बोरीडीह, गर्व कॉलेज के पास, बोरीगारका, पुलिस थाना उतई, जिला-
दुर्ग, छत्तीसगढ़ ।
(दोषी वाहन टाटा डी.आई. पिकअप क्रमांक सी.जी.-04-जे.-8814 का स्वामी)
-----अपीलार्थी
विरूद्घ
1. विजय कुमार साहू पिता दल्लू राम साहू, आयु लगभग 30 वर्ष, निवासी आमगली, ग्राम
रवेली, तहसील व जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ ।
(दोषी वाहन टाटा डी.आई. पिकअप क्रमांक सी.जी.-04-जे.-8814 का चालक)
2. श्रीमती सतरूपा साहू पति संतु उर्फ संतराम साहू, आयु लगभग 37 वर्ष,
3. संतु उर्फ संतराम साहू पिता चैतराम साहू, आयु लगभग 39 वर्ष,
प्रत्यर्थी क्रमांक-2 व 3 निवासी ग्राम रवेली, डाकघर-तर्रा, तहसील व थाना पाटन,
जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ ।-----दावाकर्तागण
-----प्रत्यर्थीगण
स्वामी/अपीलार्थी द्वारा : सुश्री स्वेच्छा शर्मा, अधिवक्ता ।
चालक/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 द्वारा : श्री कल्पेश रूपारेल, अधिवक्ता ।
दावाकर्तागण/प्रत्यर्थी क्रमांक-2 व 3 द्वारा : श्री स्वपनिल थवाने, अधिवक्ता ।
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Date:
2026.10.27
14:32:14
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न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल
!! निर्णय पीठ पर पारित !!
26/10/2026
1. मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में द्वितीय
अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, दुर्ग, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़) द्वारा मोटर दुर्घटना
दावा प्रकरण क्रमांक 76/2020, “श्रीमती सतरूपा साहू वगैरह विरुद्ध विजय कुमार साहू
वगैरह” में पारित अधिनिर्णय दिनांक 16/01/2023 को चुनौती दी गई है, जिसे आगे
संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” से संबोधित किया जा रहा है ।
2. प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि शेखर साहू (मृतक) दिनांक 06/12/2019
को अपने पिता संतु उर्फ संतराम साहू के साथ बैलगाड़ी में खेत से धान का बोझा लेकर
ब्यारा आ रहा था । उसी समय विजय कुमार साहू, वाहन टाटा डी.आई. पिकअप क्रमांक
सी.जी.-04-जे.-8814 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से संबोधित किया जा रहा
है) को तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए आया, जिसकी ठोकर लगने के फलस्वरूप
बैलगाड़ी में सवार शेखर साहू को गंभीर चोटें आईं । उसे पाटन अस्पताल ले जाया गया,
जहाँ उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई । उक्त दुर्घटना के संबंध में थाना-पाटन, दुर्ग में
अपराध क्रमांक-211/2019 के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना उपरांत
अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।
3. मृतक शेखर साहू (आयु 15 वर्ष) की उक्त दुर्घटना में मृत्यु के फलस्वरूप उसकी माँ एवं
पिता द्वारा मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के अंतर्गत प्रतिकर की मांग करते हुए दावा
आवेदन प्रस्तुत किया गया । अधिकरण द्वारा दोषी वाहन के चालक विजय कुमार साहू की

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उपेक्षा एवं उतावलेपन पाते हुए चालक विजय कुमार साहू तथा पंजीकृत स्वामी गुलाब साहू
(अपीलार्थी) को पृथकतः एवं संयुक्ततः रूप से उत्तरदायी पाते हुए कुल ₹6,63,000/-
की प्रतिकर राशि ब्याज सहित अधिनिर्णीत की गई । उक्त निष्कर्ष को अपीलार्थी-स्वामी
द्वारा इस अपील में चुनौती दी गई है ।
4. अपीलार्थी गुलाब साहू के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि दुर्घटना से पूर्व ही उन्होंने दोषी
वाहन विजय कुमार साहू को दिनांक 12/05/2019 को विक्रय कर उसका कब्जा सौंप
दिया था, किंतु प्रतिफल के रूप में विजय कुमार साहू द्वारा उनके पक्ष में जारी किया गया
प्रदर्श डी-1 का चेक अनादरित हो गया था, जिसका बैंक मेमो प्रदर्श डी-2 है । इस
प्रकार, दुर्घटना की तिथि पर दोषी वाहन का कब्जा एवं स्वामित्व विजय कुमार साहू का
था । अतः अपीलार्थी गुलाब साहू का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता, किंतु अधिकरण द्वारा
उसके विरुद्ध भी संयुक्ततः अधिनिर्णय पारित किया गया है, जो विधि की दृष्टि से स्थि र रखे
जाने योग्य नहीं है । फलतः, अपील स्वीकार कर उसके विरुद्ध पारित “प्रश्नाधीन
अधिनिर्णय” को अपास्त किया जाए तथा उसे उत्तरदायित्व से मुक्त किया जाए ।
5. चालक/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि यदि क्षेत्रीय परिवहन
कार्यालय के पंजीयन प्रमाणपत्र में नाम अंतरित नहीं हुआ है, तो इकरारनामा की उपलब्धता
के बावजूद क्रेता को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता । विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क के
Brij Bihari Gupta v. Manmet and Others, 2025 SCC
समर्थन में न्यायदृष्टांत
OnLine SC 1650
का हवाला दिया है ।
6. उभयपक्ष के तर्क श्रवण किए गए तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

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7. अभिलेख के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि स्वयं अपीलार्थी गुलाब साहू न्यायालय के समक्ष
परीक्षित हुआ है । उसने यह कथन तो किया है कि उसने दुर्घटना के पूर्व ही दिनांक
12/05/2019 को दोषी वाहन चालक विजय साहू को विक्रय कर वाहन अंतरित कर
दिया था, किंतु न तो कोई इकरारनामा पेश किया है और न ही कोई ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत
किया है, जिससे यह माना जा सके कि प्रदर्श डी-1 का चेक उक्त वाहन के विक्रय के
फलस्वरूप ही जारी हुआ था । इसके अतिरिक्त, प्रतिपरीक्षण में उसने स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है कि क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय के अभिलेख के अनुसार वह दोषी वाहन का
पंजीकृत स्वामी है तथा अभी तक नामांतरण नहीं हुआ है ।
Naveen Kumar v. Vijay Kumar and others,
8. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
(2018) 3 SCC 1
में यह प्रतिपादित किया गया है कि मोटर यान अधिनियम, 1988 की
धारा 2(30) के प्रयोजनार्थ वही व्यक्ति वाहन का स्वामी माना जाएगा, जिसके नाम पर
पंजीयन प्राधिकारी के अभिलेख में वाहन पंजीकृत है । पंजीकृत स्वामी द्वारा वाहन के
अंतरण का दावा किए जाने के बावजूद, यदि पंजीयन प्राधिकारी के अभिलेख में उसका नाम
स्वामी के रूप में बना हुआ है, तो वह प्रतिकर के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता । यह भी
स्पष्ट किया गया है कि वाहन के विक्रय एवं कब्जा सौंपे जाने मात्र से, अधिनियम के
प्रयोजनार्थ पंजीकृत स्वामी का दायित्व समाप्त नहीं होता । जिसकी कण्डि का-13 व 14
निम्नानुसार हैः-
“13. The consistent thread of reasoning which emerges from
the above decisions is that in view of the definition of
the expression “owner” in Section 2(30), it is the person
in whose name the motor vehicle stands registered who,
for the purposes of the Act, would be treated as the
“owner”. However, where a person is a minor, the

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guardian of the minor would be treated as the owner.
Where a motor vehicle is subject to an agreement of
hire purchase, lease or hypothecation, the person in
possession of the vehicle under that agreement is
treated as the owner. In a situation such as the present
where the registered owner has purported to transfer
the vehicle but continues to be reflected in the records
of the Registering Authority as the owner of the vehicle,
he would not stand absolved of liability. Parliament has
consciously introduced the definition of the expression
“owner” in Section 2(30), making a departure from the
provisions of Section 2(19) in the earlier 1939 Act. The
principle underlying the provisions of Section 2(30) is
that the victim of a motor accident or, in the case of a
death, the legal heirs of the deceased victim should not
be left in a state of uncertainty. A claimant for
compensation ought not to be burdened with following
a trail of successive transfers, which are not registered
with the Registering Authority. To hold otherwise would
be to defeat the salutary object and purpose of the Act.
Hence, the interpretation to be placed must facilitate
the fulfilment of the object of the law. In the present
case, the first respondent was the “owner” of the vehicle
involved in the accident within the meaning of Section
2(30). The liability to pay compensation stands fastened
upon him. Admittedly, the vehicle was uninsured. The
High Court has proceeded upon a misconstruction of the
judgments of this Court in Reshma [HDFC Bank Ltd. v.
Reshma, (2015) 3 SCC 679 : (2015) 2 SCC (Civ) 379 :
(2015) 2 SCC (Cri) 408] and Purnya Kala Devi [Purnya
Kala Devi v. State of Assam, (2014) 14 SCC 142 :
(2015) 1 SCC (Civ) 251 : (2015) 1 SCC (Cri) 304] .

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14. The submission of the petitioner is that a failure to
intimate the transfer will only result in a fine under
Section 50(3) but will not invalidate the transfer of the
vehicle. In T.V. Jose [T.V. Jose v. Chacko P.M., (2001) 8
SCC 748 : 2002 SCC (Cri) 94] , this Court observed that
there can be transfer of title by payment of
consideration and delivery of the car. But for the
purposes of the Act, the person whose name is reflected
in the records of the Registering Authority is the owner.
The owner within the meaning of Section 2(30) is liable
to compensate. The mandate of the law must be
fulfilled.”
9. उपरोक्त न्यायदृष्टांत के प्रकाश में यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थी गुलाब साहू दुर्घटना
की तिथि पर दोषी वाहन का पंजीकृत स्वामी था । ऐसी दशा में उसे उत्तरदायित्व से मुक्त
नहीं माना जा सकता । अपीलार्थी पक्ष का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है ।
अधिकरण द्वारा “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” में अभिलिखि त निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध
मौखि क एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अनुरूप है । अतः उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता
नहीं पायी जाती है । फलस्वरूप, अपील स्वीकार किए जाने योग्य नहीं होने से खारिज की
जाती है ।
10. निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु
सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो ।
सही/-
(संजय कुमार जायसवाल)
न्यायाधीश
पोमन