Km Farida Ansari And Another vs State Of U.P. And 5 Others

Court
Allahabad High Court

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
WRIT - C No. - 36224 of 2026
Km Farida Ansari And Another
.....Petitioner(s)
Versus
State Of U.P. And 5 Others
.....Respondent(s)
Counsel for Petitioner(s) : Amar Nath Singh, Anadi Srivastava,
Anju Yadav, Mahendra Yadav, Poonam
Yadav, Prajjwal Yadav
Counsel for Respondent(s) : C.S.C.
A.F.R
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1-
याचीगण की ओर से इस याचिका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश रिट जारी करने
की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रत्युत्तरदातागण को याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन (लिव इन
रिलेशनशिप) में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया जाए एवं संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश
देने की मांग की गयी है कि वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें।
2-
याचीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री अमर नाथ सिंह एवं उनके सहयोगी अधिवक्ता श्री अक्षांश,
अंजू यादव एवं विद्वान स्थायी अधिवक्ता श्री प्रमित कुमार पाल एवं योगेश कुमार को सुना एवं
पत्रावली का परिशीलन किया।
3-
इस न्यायपीठ के पूर्व आदेश दिनांक 10.09.2026 द्वारा याचीगण को अग्रिम नियत तिथि
पर न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश किया गया था जिसके अनुपालन में आज न्यायालय
में याची सं. 01 कुमारी फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगति कुशवाहा उपस्थित हैं जिनकी
पहचान उनके अधिवक्ता द्वारा किया गया।
4-
याचीगण के विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि दोनों याचीगण समलैंगिक है और बालिग हैं
उम्र के सम्बंध में उन्होंने अपने अपने हाईस्कूल की मार्कशीट की छाया प्रतिलिपि संलग्न की है
जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि वे बालिग हैं। विद्वान अधिवक्ता का यह भी कथन है कि वे
अविवाहित हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहीं हैं। याचीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा
कथन किया गया कि वयस्क व्यक्तियों के बीच सहमति से लिव-इन संबंध किसी अपराध की
श्रेणी में नहीं आता है। यह भी निवेदन किया गया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 14
भारत के भीतर कानून की समान सुरक्षा की गारंटी देता है और अनुच्छेद 21 जीवन और
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। वर्तमान मामले में याचीगण जो कि

WRIC No. 36224 of 2026
2
अंतरधार्मिक एवं समलैंगिक हैं और लिव-इन संबंध में होने का दावा करते हैं जो कि उन्हें
संविधान के अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार द्वारा प्रदत्त है। उक्त के
अतिरिक्त यह भी कथन किया गया है कि निजी प्रतिवाद और परिवार के अन्य सदस्य नाराज हो
गए हैं और उनके जीवन को गंभीर खतरा है क्योंकि उन्हें धमकी दी जा रही है और परेशान
किया जा रहा है। इसलिए, याचीगण ने निजी प्रतिवादियों से अपने जीवन की रक्षा के लिए
पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के
तहत यह रिट याचिका दायर की है।
5-
याचीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा आगे यह भी कथन किया गया कि संवैधानिक नैतिकता
एवं मूल अधिकारों का सार है कि किसी भी बालिग नागरिक का अपनी स्वेच्छा से जीवन साथी
चुनना अथवा सहजीवन का चयन करना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और निजता के
अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और
वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार हमारे संवैधानिक लोकतंत्र का सर्वोच्च आधारस्तम्भ है। साथ
ही उन्होंने न्यायालय का ध्यान माननीय उच्चतम न्यायालय की विभिन्न नजीरों पर आकृष्ट करते
SCC 1]
हुए नवतेज सिंह जौहर व अन्य बनाम भारत संघ [(2018) 10 का हवाला दिया
जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय ने वयस्क व्यक्तियों के मध्य सहमतिजन्य संबंधों को
sexual orientation)
अपराधमुक्त करते हुए यह सुस्पष्ट किया था कि लैंगिक रुझान ( व्यक्ति
की स्वतंत्रता, गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अंतर्निहित पहलू है, और
न्यायपालिका का यह परम दायित्व है कि वह लोक नैतिकता के स्थान पर संवैधानिक नैतिकता
का संरक्षण सुनिश्चित करे।
6-
विद्वान स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि समलैंगिक रिश्ते की सामाजिक स्वीकार्यता
नहीं है। किसी व्यक्ति को अपनी पसंद का साथी चुनने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत
संरक्षित है। हालाँकि, इस तरह के चुनाव की विधायी मान्यता एक मौलिक अधिकार नहीं है।
आगे उन्होंने विरोध प्रकट करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि समाज का एक पारंपरिक वर्ग यह
मानता है कि विवाह और परिवार की व्यवस्था पुरुष और महिला के बीच होती है, जिससे वंश
आगे बढ़ता है। उनका तर्क है कि समलैंगिक संबंध इस प्राकृतिक और पारंपरिक ढांचे को
प्रभावित करते हैं।
7-
दोनों याचीगण (याची सं. 01 कु.फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगति कुशवाहा)
व्यक्तिगत रूप से आज इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुईं। न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर
दोनों ने स्पष्ट, सुदृढ़ एवं निर्भीक शब्दों में यह बयान दर्ज कराया कि वे बालिग हैं और उन्होंने
किसी भी दबाव, भय अथवा अनुचित प्रभाव के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा व समलैंगिक
अभिरुचि से एक साथ रहने का निर्णय लिया है। उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया कि वे
एक-दूसरे के साथ ही सहजीवन (लिव-इन रिलेशनशिप) में रहना चाहती हैं तथा भविष्य में भी

WRIC No. 36224 of 2026
3
साथ ही रहेंगी। न्यायालय ने उनका व्यक्तिगत साक्षात्कार कर यह पाया कि दोनों वयस्क हैं,
अपने भले-बुरे को समझने में पूर्णतः सक्षम हैं और उनका यह निर्णय स्वतंत्र सहमति पर
आधारित है।
8.
याची सं. 01 कु.फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगति कुशवाहा द्वारा एक सफेद कागज
में बयान अंकित किया गया जिसको पत्रावली पर रखा गया जिसका सार निम्नवत है।
"
जिसमें याची सं. 01 कुमारी फरीदा अंसारी द्वारा बयान में कथन किया कि वह
याची सं. 02 के साथ समलैंगिक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों
वयस्क हैं और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपत्ति नहीं है उन्होंने
आगे यह भी कथन किया कि प्रतिवादी संख्या 5 (शाहबुद्दीन अंसारी) और
प्रतिवादी संख्या 6 (प्रेम कुशवाहा) द्वारा उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा उत्पन्न
की जा रही हैं, इसलिए प्रतिवादियों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध किया
गया है।
याची सं. 02 कुमारी प्रगति कुशवाहा द्वारा बयान में कथन किया कि वह याची
सं. 01 के साथ समलैंगिक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों वयस्क हैं
और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपत्ति नहीं है उन्होंने आगे यह
भी कथन किया कि प्रतिवादी संख्या 5 (शाहबुद्दीन अंसारी) और प्रतिवादी संख्या
6 (प्रेम कुशवाहा) द्वारा उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा उत्पन्न की जा रही हैं,
इसलिए प्रतिवादियों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध किया गया है।"
9-
माननीय उच्चतम न्यायालय का निर्णय: समलैंगिक युगलों तथा क्वीयर समुदाय के
अधिकारों एवं उनकी विधिक स्थिति पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा
SCC OnLine SC
सुप्रियो उर्फ सुप्रिया चक्रवर्ती व अन्य बनाम भारत संघ [(2023)
1348]
में विस्तृत विचार-विमर्श किया गया के निर्णय के “प्रस्तर 149” में शीर्ष अदालत ने

अपने निष्कर्षों एवं विधिक स्थिति को निम्नानुसार समाहित किया है:
“149. This court hereby summarizes its conclusions
and directions as follows:
i. There is no unqualified right to marriage except
that recognised by statute including space left by
custom.
ii. An entitlement to legal recognition of the right to
union – akin to marriage or civil union, or conferring
legal status upon the parties to the relationship can be
only through enacted law. A sequitur of this is that the

WRIC No. 36224 of 2026
4
court cannot enjoin or direct the creation of such
regulatory framework resulting in legal status.
iii. The finding in (i) and (ii) should not be read as
to preclude queer persons from celebrating their
commitment to each other, or relationship, in
whichever way they wish, within the social realm.
iv. Previous judgments of this court have established
that queer and LGBTQ+ couples too have the right to
union or relationship (under Article 21) – 'be it
mental, emotional or sexual' flowing from the right to
privacy, right to choice, and autonomy. This, however,
does not extend to a right to claim entitlement to any
legal status for the said union or relationship.
v. The challenge to the SMA on the ground of under
classification is not made out. Further, the petitioner's
prayer to read various provisions in a 'gender neutral'
manner so as to enable same-sex marriage, is
unsustainable.
vi. Equality and non-discrimination are basic
foundational rights. The indirect discriminatory
impacts in relation to earned or compensatory
benefits, or social welfare entitlements for which
marital status is a relevant eligibility factor, for queer
couples who in their exercise of choice form
relationships, have to be suitably redressed and
removed by the State. These measures have to be taken
by the Union and State governments.”
10- iv)
सुप्रियो (उपरोक्त) के “प्रस्तर 149” के उप-खंड ( से यह पूर्णतः स्थापित और
निर्विवाद है कि क्वीयर तथा एलजीबीटीक्यू+ युगलों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के
union or relationship)
अंतर्गत संबंध या सहजीवन ( स्थापित करने का अक्षुण्ण मौलिक
अधिकार प्राप्त है—चाहे वह मानसिक, भावनात्मक अथवा शारीरिक सहचर्य हो जो निजता के
अधिकार, पसंद की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता से सीधे उद्भूत होता है। यद्यपि ऐसे
संबंधों को विधि के तहत वैवाहिक दर्जा प्रदान करना विधायिका के क्षेत्राधिकार में है, तथापि दो
वयस्क नागरिकों के साथ रहने और शांतिपूर्ण सहजीवन व्यतीत करने के मूल अधिकार को
संविधान का संपूर्ण संरक्षण प्राप्त है।

WRIC No. 36224 of 2026
5
11-
उक्त के संदर्भ में यह स्पष्ट किया कि जब दो वयस्क व्यक्ति स्वेच्छा से साथ रह रहे हों, तो
उनकी लैंगिक पहचान या सामाजिक विरोध के आधार पर उनके जीवन और स्वतंत्रता पर कोई
आंच नहीं आने दी जा सकती।
12-
उभय पक्षों के तर्कों एवं याचीगण के बयानों एवं सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
की द्वयपीठ की प्रमुख नजीरो को ध्यान में रखते हुए न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि
जब दो वयस्क नागरिक अपनी व्यक्तिगत स्वायत्तता और पसंद से एक साथ रहने का निर्णय
लेते हैं, तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सहजीवन (लिव-इन रिलेशनशिप) में
रहना उनका मौलिक अधिकार है। परिवार के सदस्यों, संबंधियों अथवा समाज के किसी भी वर्ग
को उनके इस शांतिपूर्ण सहजीवन में विघ्न डालने, उन्हें डराने-धमकाने अथवा उनकी शारीरिक
स्वतंत्रता का हनन करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। वैवाहिक मान्यता का अभाव किसी
भी तीसरे पक्ष या प्रशासनिक तंत्र को वयस्क नागरिकों की गरिमा और शारीरिक सुरक्षा पर
प्रहार करने की छूट नहीं देता। जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार संवैधानिक व्यवस्था
में सर्वोपरि है। साथ ही सहजीवन एवं स्वायत्तता का अधिकार (अनुच्छेद 21): नवतेज सिंह
जौहर एवं सुप्रियो बनाम भारत संघ के निर्णयों का संदर्भ लेते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि
दो बालिग व्यक्तियों को आपसी सहमति से भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंध बनाने
का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अपनी पसंद का साथी चुनना व्यक्ति की निजता, स्वायत्तता और
गरिमा का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रियो मामले (प्रस्तर 149) के अनुसार, यद्यपि समलैंगिक
विवाह को विधिक मान्यता देना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है, किंतु दो बालिग व्यक्तियों के
शांतिपूर्ण सहजीवन (लिव-इन संबंध) पर कोई कानूनी रोक नहीं है और इसे संविधान का पूर्ण
संरक्षण प्राप्त है।
13-
उपरोक्त विधिक स्थिति एवं संवैधानिक अधिदेशों के दृष्टिगत इस न्यायालय का अभिमत है
कि याचीगण, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पूर्णतः संरक्षित हैं, याचीगण बालिग है, समलैंगिक हैं,
शिक्षित हैं, अपना भला-बुरा समझने में पूर्णतः सक्षम है, खूब सोच-विचार करने के पश्चात एक
साथ रहने का निर्णय लिया है जिस पर किसी के द्वारा जोर जबरदस्ती नहीं की गयी है अतः
याचीगण द्वारा लिव इन रिलेशनशिप में एक साथ रहने का विरोध करने का किसी को कोई
अधिकार नहीं है तथा न्यायालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना को स्वीकार न करने
का कोई कारण नहीं दिखता तथा उनकी यह याचिका स्वीकार किये जाने योग्य है।
14-
तद्नुसार यह याचिका स्वीकार की जाती है। याचीगण को शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ रहने
की स्वतंत्रता है तथा उनके परिवारीजन या अन्य किसी व्यक्ति को उनके एक साथ लिव-इन
रिलेशनशिप में रहने में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
15-
यदि याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो याचीगण
इस आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित पुलिस आयुक्त/एसएसपी/एसपी से संपर्क करेंगे

WRIC No. 36224 of 2026
6
और पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करने के बाद कि याचीगण वयस्क हैं और स्वेच्छा से एक
साथ रह रहे हैं, याचीगण को तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे।
16-
निजी प्रत्युत्तरदाता को यह स्वतंत्रता प्रदान की जाती है कि यदि याचीगण द्वारा अभिलेख
पर लाए गए दस्तावेज मनगढ़न्त या फर्जी हैं तो वे इस आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल
आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
17-
इस निर्णय को समाप्त करते हुए, मेैं अपनी रिसर्च एसोसिएट सुश्री जाह्न्वी सिंह के
समर्पित शोध प्रयासों के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूं।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 14, 2026
S.Mishra
Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad